मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबर

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबर

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबर। अभी कुछ हफ्ते पहले ही मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के विशेष दूत के रूप में विदेश मंत्री मोहम्मद असीम भारत आए थे। तब मालदीव की कथित ‘इंडिया फर्स्ट नीति’ के रूप में इसे देखा गया था। इस तथ्य की ओर बहुत ध्यान नहीं गया कि इसी बीच भारत-मालदीव के संबंध इतने बिगड़ गए कि यामीन सरकार ने किसी भी भारतीय चिंता के प्रति जवाबदेही ही खत्म कर दी। ऐसे में यह स्पष्ट हो गया कि यामीन सरकार के लिए इंडिया फर्स्ट अब चाइना फर्स्ट हो गया है, लेकिन ऐसा हुआ कैसे।

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबरइस संबंध में सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि राष्ट्रपति यामीन चीन को मालदीव नहीं लाए थे। मालदीव में चीन की एंट्री का क्रेडिट पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को जाता है जिन्होंने 2011 में राजधानी माले में चीन को दूतावास खोलने की अनुमति दी। उन्होंने भारत की चिंताओं के बावजूद मालदीव में चीन की आर्थिक मौजूदगी के लिए रास्ते खोल दिए। हालांकि यामीन ने चीन के साथ संबंधों को नया आयाम जरूर दिया और इस दौरान भारत के प्रति उनका अविश्वास भी बढ़ा। भारत के लिहाज से मालदीव ने खतरे की लाइन तब पार की जब यामीन सरकार ने दिसंबर 2017 में चीन के साथ फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (FTA) किया। इसे जल्दबाजी में अंजाम दिया गया और सदस्यों को डील के मसौदे को पढ़ने और स्वीकार करने के लिए 15 मिनट से भी कम समय दिया गया। भारत ने मालदीव के साथ 1981 में ही विशेष व्यापार संधि की थी। इसके मुताबिक भारत मालदीव को सारी जरूरत की चीजें, अग्रीगेट्स और रेत की सप्लाई करता। वहीं मालदीव अपने यहां बनी किसी भी चीज को बिना किसी बाधा के भारत को बेच सकता था।

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यह व्यवस्था सुचारु रूप से चल भी रही थी। इस बीच नई दिल्ली को यह महसूस हुआ कि चीन के साथ FTA भारत को ही निशाने पर रख कर किया गया था। खासकर तब जब यामीन ने घोषणा की कि वह ऐसा ही अग्रीमेंट मोदी सरकार के साथ भी करना चाह रहे हैं। एफटीए ने मालदीव में सस्ते चीनी सामानों के लिए रास्ता खोल दिया। भारत के साथ 1981 की संधि मालदीव की भारत में असीमित पहुंच का रास्ता तो खोलती थी लेकिन इस व्यवस्था में तीसरे मुल्क से री-एक्सपोर्ट की जगह नहीं थी। भारत के ट्रेड ऑफिशल्स को यह महसूस हुआ कि FTA चीन द्वारा भारत के पड़ोसियों के रास्ते भारत के बाजार तक पहुंच बनाए जाने का एक तरीका है। श्री लंका में भी हंबनटोटा में न्यू SEZ को भारतीय बाजार को ही निशाने पर रख कर अंजाम दिया गया। भारत ने न केवल FTA के आइडिया को खारिज किया बल्कि अपनी चिंताओं से अवगत कराने के लिए मालदीव के राजदूत को भी बुलाया। दरअसल 2017 में उठे कुछ गलत कदमों के बाद भारत की तरफ से ऐसी कोशिश की गई।

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव अपने यहां बनी किसी भी चीज को बिना किसी बाधा के भारत को बेच सकता था

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबरखासकर तब जब मालदीव ने घोषणा की कि वह अपने द्वीपसमूह में चीन के युद्धक जहाज को आने की अनुमति देगा। भारत ने इसपर मालदीव को अर्जेंट मेसेज भेज अपनी चिंताओं से अवगत कराते हुए इसे अपनी सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक बताया। इसपर यामीन ने जवाब भेजा कि चीन का युद्धक बेड़ा सद्भावना यात्रा पर है और वह इसे इनकार नहीं कर सकते। ऐसे में लगातार यामीन के राजनीतिक विरोधियों की अनदेखी कर रहे भारत ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप अगस्त में पूर्व राष्ट्रपति नशीद की पहली भारत यात्रा को अनुमति दे दी। भारत ने यह कदम विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर और पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर की मालदीव यात्राओं के बाद लिया। भारत को मालदीव में अन्य झटके भी लगने शुरू हुए, खासकर वहां जहां सीधे चीन के हित जुड़े थे। उदाहरण के लिए मालदीव में भारतीय रेडार इंस्टालेशन प्रॉजेक्ट की रफ्तार धीमी हो गई। यामीन सरकार अपने दक्षिणी हिस्से से भारत की मौजूदगी को दूर करने की कोशिश शुरू कर दी जहां चीन ने काफी निवेश कर रखा है। भारत ने iHavan के लिए पहले से एक प्रॉजेक्ट प्लान दे रखा था। भारत की शर्त थी कि चीन को इससे दूर रखना होगा, हालांकि जापान जैसे दूसरे मित्र देशों के लिए इसे खुला रखने का प्रस्ताव भी था।

मालदीव संकट इंडिया फर्स्ट की बजाय चाइना फर्स्ट की ओर है मालदीव जानिये खबर मालदीव ने घोषणा की

यामीन ने यहां भी भारत के साथ गेम किया। एक तरफ तो उन्होंने भारत से पैसे मांगे, दूसरी तरफ चीन को अपने साथ करने की कोशिश की। iHavan प्रॉजेक्ट भारत के काफी करीब है और 8-डिग्री चैनल को नियंत्रित करता है जिसपर चीन की बारीक नजर है। 2016 में भारत ने यामीन सरकार के साथ डिफेंस सहयोग डील को अंजाम देने के अलावा और भी दूसरे अग्रीमेंट्स किए थे। इतना सबकुछ मालदीव से चीन को दूर रखने की उम्मीद में किया गया था, लेकिन FTA ने ड्रैगन के लिए मालदीव के दरवाजों को और भी खोल दिया। गुरुवार को चीन में मालदीव के विशेष दूत मोहम्मद सईद ने चीनी निवेशों की सुरक्षा के लिए चीन से सुरक्षा की भी मांग की है। हालांकि चीन ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है क्योंकि इससे भारत के और भी भड़कने की आशंका है। इसके बावजूद यह यामीन की बढ़ती बेचैनी का एक और सबूत है।

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