मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें। हिंद-प्रशांत क्षेत्र का छोटा सा द्वीपीय देश मालदीव इस वक्त गहरे सियासी संकट से जूझ रहा है। राजनीतिक विरोधियों को रिहा करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानने से इनकार करने वाले राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने 15 दिनों के इमर्जेंसी का ऐलान कर दिया है। संसद पहले ही भंग की जा चुकी है। इमर्जेंसी के ऐलान के बाद कुछ ही घंटों के भीतर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस अब्दुल्ला सईद और एक दूसरे जज के साथ-साथ पूर्व राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम (मौजूदा राष्ट्रपति के सौतेले भाई) को गिरफ्तार किया जा चुका है। पड़ोसी देश के घटनाक्रम पर भारत की करीबी नजर है। 2 दिन पहले ही मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने भारत से मदद की गुहार लगाई थी।

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

मालदीव के ताजा राजनीतिक संकट की जड़ें 2012 में तत्कालीन और पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद के तख्तापलट से जुड़ी हुईं हैं। नशीद के तख्तापलट के बाद अब्दुल्ला यामीन राष्ट्रपति बने। उन्होंने चुन-चुनकर अपने राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाया। नशीद को 2015 में आतंकवाद के आरोपों में 13 साल जेल की सजा भी हुई लेकिन वह इलाज के लिए ब्रिटेन गए और वहां राजनीतिक शरण ले ली। मुहम्मद नशीद को भारत समर्थक माना जाता है। पिछले हफ्ते मालदीव के सुप्रीम कोर्ट ने नशीद समेत 9 राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अब्दुल्ला यामीन की पार्टी से बगावत करने वाले 12 सांसदों को भी बहाल करने का आदेश दिया। इन 12 सांसदों की सदस्यता बहाल होने के बाद यामीन सरकार अल्पमत में आ जाती और नशीद की पार्टी की अगुआई वाला संयुक्त विपक्ष बहुमत में आ जाता। लेकिन अब्दुल्ला यामीन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानने से इनकार कर दिया और सेना को स्पष्ट आदेश दिया कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की नाफरमानी करे।

रणनीतिक लिहाज से मालदीव भारत के लिए अहम

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानेंमालदीव के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृति संबंध हैं। हालांकि 2013 में अब्दुल्ला यामीन के राष्ट्रपति बनने के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। महज सवा 4 लाख आबादी वाला यह छोटा सा देश भारत के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है और यह अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से रणनीतिक लिहाज से काफी अहम है। मालदीव रणनीतिक रूप से कितना अहम है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इतनी कम आबादी वाले इस देश में चीन आक्रामक अंदाज में पैसे लगा रहा है। जाहिर है चीन वहां इसलिए पैसे नहीं लगा रहा कि वह उसके लिए कोई आकर्षक बाजार है। इसकी इकलौती वजह रणनीतिक है। चीन की महत्वाकांक्षा कहीं न कहीं मालदीव में मिलिटरी बेस बनाने की भी है। मौजूदा तानाशाह अब्दुल्ला यामीन को चीन का करीबी माना जाता है।

हाल के वर्षों में चीन की तरफ झुका मालदीव

हाल के वर्षों में मालदीव का भारत के बनिस्पत चीन की तरफ झुकाव बढ़ रहा है। 2012 में हुए सैन्य तख्तापलट में मालदीव के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था। उसके बाद चीन ने मालदीव को अपने पाले में करने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाई। चीन ने एक तरह से मालदीव को कर्ज के जाल में फंसा लिया है। मालदीव के लिए कुल अंतरराष्ट्रीय कर्ज में करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी तो अकेले चीन की है। हैरानी की बात यह है कि 2011 तक मालदीव में जिस चीन का दूतावास तक नहीं था, वह अब वहां की घरेलू राजनीति में प्रभावी दखल रखता है। मालदीव अब चीन के महत्वाकांक्षी बेल्ट ऐंड रोड इनिशटिव (BRI) का हिस्सा है। पिछले साल चीन और मालदीव ने फ्री ट्रेड अग्रीमेंट (FTA) पर दस्तखत किए थे। चीन के साथ FTA समझौते को मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद ने देश की संप्रभुता के लिए खतरा बताया था।

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

माले के इंटरनैशनल एयरपोर्ट का मसला भी मालदीव में चीन के बढ़ते दखल को बताता है। माले एयरपोर्ट को बनाने का ठेका एक भारतीय कंपनी को मिला था लेकिन वह ठेका रद्द करके चीन की एक कंपनी को दे दिया गया। अभी हाल ही में मालदीव के एक सरकार समर्थक अखबार माने जानेवाले अखबार ने चीन को मालदीव का नया बेस्ट फ्रेंड और भारत को ‘शत्रु देश’ बताया था।

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

मालदीव के साथ भारत के सदियों पुराने व्यापारिक और सांस्कृति संबंध रहे हैं। जब-जब इस द्वीपीय देश पर कोई संकट आया है तो भारत ने बिना कोई देर किए सबसे पहले मदद की है। मिसाल के तौर पर 1988 में जब मालदीव में तख्तापलट की कोशिश को भारत ने नाकाम किया था। तब अब्दुल्ला लुतूफी नाम के विद्रोही नेता ने श्री लंकाई विद्रोहियों की मदद से तत्कालीन राष्ट्रपति मौमून अब्दुल गयूम की सत्ता पलटने की कोशिश की थी। इस संकट से निपटने के लिए मालदीव ने भारत और अमेरिका समेत अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद की गुहार लगाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तत्काल भारतीय वायु सेना को मालदीव की मदद का निर्देश दिया। भारतीय वायुसेना के ऑपरेशन में सारे विद्रोही या तो ढेर कर दिए गए या फिर गिरफ्तार। भारत की इस कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तारीफ हुई। भारतीय वायुसेना के उस अभियान को ‘ऑपरेशन कैक्टस’ के नाम से जाना जाता है।

मालदीव में क्यों खड़ा हुआ राजनीतिक संकट और क्यों है भारत की करीबी नजर जानें

इसी तरह दिसंबर 2014 में माले में वॉटर सप्लाइ कंपनी के जेनरेटर कंट्रोल पैनल में भीषण आग लग गई थी। इस वजह से पूरे देश में पेयजल का अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया। मालदीव सरकार ने भारत सरकार से मदद मांगी। भारत ने तत्काल मदद करते हुए आईएनएस सुकन्या को पानी के साथ माले के लिए रवाना किया। इसके अलावा आईएनएस दीपक को 1000 टन पानी के साथ माले भेजा गया। भारतीय वायुसेना ने भी अपने एयरक्राफ्ट्स के जरिए सैकड़ों टन पानी माले पहुंचाया था। भारत के इस अभियान को ‘ऑपरेशन नीर’ नाम से जाना जाता है।

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